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पांडवों की बिल्ली और कौरवों की मुर्गी कैसे बनी महाभारत का कारण: (कुमाऊनी लोक साहित्य)

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कुमाऊं का यह दुर्भाग्य रहा है कि यहां का लोक साहित्य कभी सहेज कर ही नहीं रखा गया. इतिहास में ऐसी कोई कोशिश दर्ज नहीं है जिसमें यहां की परम्परा और संस्कृति को सहेजने की ठोस कोशिश देखने को मिले. कुमाऊं की जागरों में गाई जाने वाली ‘भारत’ इसका एक सामान्य उदाहरण है. कुमाऊं में जागरों के साथ भारत का गायन होता. भारत का अर्थ महाभारत से है जिसे स्थानीय भाषा में ‘भारत’ कहा जाता है. पहले पूरे कुमाऊं क्षेत्र में तो 22 दिन की बैसी में भारत (महाभारत) गाई जाती थी. यहां गाई जाने वाली महाभारत यहां के लोक में रची बसी है. यहां कौरव और पांडव के बीच युद्ध के कारण अलग हैं. यहां गाई जाने वाली भारत (महाभारत) में पांडवों और कौरवों से जुड़ी ऐसी घटनाओं का वर्णन होता है जो अन्य किसी भी महाभारत में सुनने को नहीं मिलता. कुमाऊं में गाई जाने वाली भारत (महाभारत) में कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध का मुख्य कारण यहां किसी राज्य को लेकर नहीं होता. यहां होता कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध का कारण उनके जानवरों के बीच होने वाली लड़ाई है या फिर मधुमक्खी के छत्ते से निकलने वाला शहद. कहीं पांडवों की बिल्ली और कौरवों की मुर्गी ...

कुमाऊं शब्द का पुराणों से अभिलेखों तक (The word Kumaon is mentioned from puranas to records)

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    देवाश्श्च तुष्टुवुरदवें नारादाद्या महर्षश्यः। कूर्मरूपधरं दृष्ट्वा साक्षिणं विष्णुव्यमं।। जिस स्थान को वर्तमान में कुमाऊं कहा जाता है मध्य हिमालय के इस भाग के लिए पौराणिक ग्रन्थों में कूर्मांचल नाम का प्रयोग किया गया है. पुराणों  में  कुमाऊं     कुमाऊँ शब्द की उत्पत्ति के बारे में सबसे मान्य तथ्य है कि चम्पावती नदी के पूरब में मौजूद कूर्म पर्वत पर भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार कूर्म यानी कछुवे का रूप धारण कर तीन साल तक तपस्या की. एक ही जगह पर खड़े रहने की वजह से कूर्म भगवान के चरणों के चिन्ह पत्थर पर रह गये. कछुए का अवतार धारण किये भगवान विष्णु को देखकर देवतागण आदि मुनीवरों ने उनकी आराधना की. तभी से इस पर्वत का नाम कूर्मांचल हुआ जिसका अर्थ है जहां कूर्म अचल हो गये थे. कूर्मांचल का प्राकृत रूप बिगड़ते-बिगड़ते पहले कुमू हुआ और बाद में यही शब्द कुमाऊँ हो गया. पहले यह नाम चम्पावत और उसके आस-आस के गाँवों को दिया गया. काली नदी के किनारे के चालसी, गुमदेश, गंगोल और उनसे लगती हुई पट्टियाँ ही कूर्मांचल या कुमाऊँ कहलाती थी. एटकिंसन ने चम्पावत के पास फुगर पहाड़ी पर म...