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उत्तरकाशी का त्रिशूल- एक आदिकालीन दिव्यास्त्र (Trishul of Uttarkashi - A Primitive Divine Weapon)

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  हिमालय की रमणीय घाटी में उत्तरकाशी एक ऐसा मनोहारी स्थल है , जहाँ स्वंय महादेव भोलेनाथ निवास करते हैं। उत्तरकाशी   को कलयुग की काशी और मुक्तिक्षेत्र कहा गया है। यहाँ ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो देव निवास करते हैं।   काशी   की तरह उत्तरकाशी में भी विश्वनाथ मंदिर है। "इसी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में माँ पार्वती का शक्ति मंदिर है। और इस शक्ति मंदिर में स्थापित है ,एक आदिकालीन दिव्यास्त्र त्रिशूल" पौराणिक कथाओं के आधार पर कहा जाता है , कि उत्तरकाशी का यह त्रिशूल प्राचीन काल में देवासुर संग्राम के समय से यहाँ स्थापित है। "स्कन्द पुराण के केदार खंड में इस शक्ति मंदिर का वर्णन राजराजेश्वेरी माता शक्ति के नाम पर किया गया है।" कहा जाता है कि प्राचीन काल में जब देवासुर संग्राम में देवता असुरों से हारने लगे थे तब उन्होंने माँ भगवती को स्मरण किया। तब उन्होंने शक्ति रूप धारण करके असुरों का संहार किया और फिर यहाँ उत्तरकाशी के इस शक्ति स्तम्भ में स्थापित हो गई। उत्तरकाशी में शक्ति मंदिर में स्थापित इस दिव्य त्रिशूल  के दर्शन का विशेष म...

कुमाऊं और गढ़वाल का प्रमुख आस्था का केंद्र है देघाट मां भगवती का मंदिर

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देघाट   मां  भगवती  मंदिर अल्मोड़ा समेत पौड़ी,चमोली जिले की सीमा पर स्थित देघाट मां भगवती का मंदिर कुमाऊं समेत गढ़वाल मंडल के लोगों के लिए सदियों से प्रमुख आस्था का केंद्र है। स्याल्दे के मसाणगढि व बिनोद दो नदियों के संगम पर स्थित मां भगवती के मंदिर में हर वर्ष नवरात्रि में दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोग दूर-दूर से अटूथ आस्था संजोये मंदिर में मन्नत मांगने पहुंचते हैं। मनोकामना पूर्ण होने के बाद परिवार सहित मंदिर पहुंच कर विशेष पूजा अर्चना करते हैं। चैत्र नवरात्र में यहां सप्तमी और अष्टमी को विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें अल्मोड़ा समेत पौड़ी,चमोली के लोग भी मंदिर पहुंच कर पूजा अर्चना कर मन्नत मांगते हैं। करीब सौ साल पुराने मां भगवती मंदिर का अपना अलग ही इतिहास बया करता है। एक दिन तल्ली चम्याडी निवासी बंगारी परिवार के पूर्वज के सपने में प्रकट होकर मां भगवती ने उसे बताया कि वह पौडी जिले कि किसी स्थान पर हैं। वहां से उन्हें वह देघाट में लेकर स्थापित कर दें। इसके बाद बंगारी परिवार ने क्षेत्र के लोगों से इस बात को लेकर चर्चा की। कुछ अन्य ...

(Rumex Hestatus) रुमेक्स हेस्टैटस एक औषधीय घास है जिसके नाम पर अल्मोड़ा की पहाड़ी का नाम रखा गया है

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"अल्मोड़ा उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का मुख्य जिला और शहर है। चंद राजाओं ने अल्मोड़ा की स्थापना की। अल्मोड़ा का पुराना नाम राजापुर था। बाद में इस क्षेत्र में रुमेक्स हेस्टेटस नामक अधिक घास की उपस्थिति और इस क्षेत्र में इसके अधिक उपयोग के कारण इस घास के कुमाऊँनी नामों के बाद इस शहर का नाम अल्मोड़ा रखा गया, भीलमोड़ा, चालमोरा। क्योंकि यह घास अल्मोड़ा क्षेत्र में अधिक पाई जाती है। उस समय कटारमल सूर्य मंदिर में बर्तन साफ ​​करने के लिए इस घास का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता था।" कुमाऊंनी में वैज्ञानिक नाम रुमेक्स हेस्टैटस वाले पौधे को चालमोरा, चालमोरा, भीलमोड़ा, भीलमोड़ा आदि नामों से जाना जाता है। चालमोड़ा को हिन्दी में चुरकी, चुरकी, चुरका, चुरका या खट्टा पालक भी कहते हैं। पंजाबी में इसे खट्टीमल, कट्टमल कहते हैं। भीलमोड़ा को अंग्रेजी में ARROWLEAF DOCK कहते हैं। यह पौधा Polygonaceae (POLYGONACEAE) परिवार का है। यह एक से दो फीट ऊंचे झाड़ी के रूप में उगता है। इसमें असंख्य छोटे गुलाबी फूल गुच्छों के रूप में उगते हैं। यह पौधा पहाड़ों में अधिक होता है। यह पौधा भारत के लगभग सभी हिम...

पार्थिवपूजा (शिवार्चन) हेतु शिवपीठ

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कुमाऊँ में, विशेषकर सावन माह में, पार्थिवपूजा का विधान घर घर में होता है। शिवार्चन के लिए तैयार की जाने वाली पीठ को शिवपीठ कहते हैं। इसकी संरचना गेरू से लीपे हुए स्थल पर चावल के बिस्वार से बिन्दुओं द्वारा की जाती है। दस अथवा बारह की संख्या में इन बिन्दुओं को अनामिका अंगुली से आड़ा-सीधा, एक के ऊपर एक रख कर जोड़ दिया जाता है। पूर्ण होने पर यांत्रिक संरचना की जाती है, जोकि सुरक्षा -कवच है।  इसी प्रकार, शिव-शक्ति पीठ की संरचना भी होनी आवश्यक है। ताँबे की परात में सफेद वस्त्र में शिव शक्ति पीठ का रेखांकन पिठवा (रोली) से किया जाता है। षष्ठकोण की आकृति में परस्पर दो त्रिभुजाकार रेखाओं से बना मण्डप को शिव शक्ति पीठ कहते हैं। बीच में एक छोटा त्रिभुज रेखांकित कर उसके सभी कोणों को वृत में बन्द कर, आठ कमल की पंखुड़ियों रेखांकित की जाती हैं। पुनः वृत में बनकर सोलह कमल की पंखुड़ियों रेखांकित की जाती है। उसके बाहर चारों दिशाओं में यांत्रिक संरचना की जाती है।